Friday, September 7, 2018

एलजीबीटी की पहचान सतरंगे झंडे की कहानी क्या है

र्वोच्च अदालत ने जैसे ही समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटाया, हर ओर इन्द्रधनुषी रंगों वाला झंडा शान से लहराने लगा.
ये रेनबो फ़्लैग एलजीबीटी समुदाय की पहचान है. दुनियाभर के समलैंगिक लोग अपनी एकजुटता दिखाने के लिए इन रंगों को लहराते दिख जाते हैं.
मानवाधिकार कार्यकर्ता पीटर टैटचल ने कहा, "मुझे नहीं लगता कि विश्व में किसी भी दूसरे प्रतीक को ऐसी मान्यता मिली है."
इस रेनबो फ़्लैग को 1978 में एलजीबीटी समुदाय के प्रतीक के रूप में मान्यता दी गई. सैन-फ्रांसिस्को के कलाकार गिलबर्ट बेकर ने आठ रंगों वाला डिज़ाइन पेश किया था. ये झंडा 25 जून को गे फ़्रीडम डे के दिन पहली बार फ़हराया गया था.
बेकर ने कहा था कि वो इसके ज़रिए विविधता को दिखाना चाहते थे और बताना चाहते थे कि उनकी सेक्शुएलिटी उनका मानवाधिकार है.
सैन-फ्रांसिस्को के बाद ये झंडा न्यूयॉर्क और लॉस एंजिल्स के खुले आसमान में फ़हराया गया. 1990 आते-आते ये झंडा दुनियाभर में एलजीबीटी समुदाय का प्रतीक बन गया.
सबसे पहले रेनबो फ़्लैग में आठ रंग जोड़े गए थे और हर रंग ज़िंदगी के एक अलहदा पक्ष को बयां करता था. इन रंगों का मतलब इस प्रकार है -
बाद में इन रंगों को घटाकर छह कर दिया गया. फ़िरोज़ी रंग की जगह नीले रंग ने ले ली, जबकि बैंगनी रंग को हटा दिया गया.
फ़्लैग इंस्टीट्यूट के ग्राहम बार्टम कहते हैं, " इस झंडे को इतना पसंद किए जाने का कारण इसकी सादगी है जो सबको साथ लेकर चलती है. ये ओलंपिक रिंग्स जैसा ही है, जिसे इस तरह से डिज़़ाइन किया गया है कि भाग लेने वाले सभी देशों के झंडे के रंग इसमें शामिल हो सकें"
बार्टम का कहना है कि अगर बेकर ने इस झंडे के साथ कुछ और बदलाव किए होते, जैसे की मेल सेक्शुएलिटी को दिखाने के लिए दो गोल आकार को एक तीर से जोड़ दिया होता तो शायद ये इतना प्रसिद्ध नहीं होता.
लेकिन इस डिज़ाइन को एक आज़ादी के प्रतीक की तरह स्वीकृति नहीं मिली है. जमाईका में गे सेक्स ग़ैरकानूनी है, वहां के अटॉर्नी जनरल ने ओरलैंडो शूटिंग के बाद अमरीकी दूतावास पर रेन्बो झंडा फहराए जाने को असभ्य बताया था.
रेन्बो झंडे का एक बड़ा इतिहास रहा है. 18वीं शताब्दी के क्रांतिकारी थॉमस पैने ने जंग के दौरान सुझाव दिया था कि जो जहाज़ जंग में नहीं हैं, उन्हें इस झंडे का इस्तेमाल करना चाहिए.
20वीं सदी की शुरुआत में शातिं का पैगाम देने वाले जेम्स विलियम वैन कर्क ने एक झंडा डिज़ाइन किया था जिसमें रेन्बो स्ट्रिप को ग्लोब से जोड़कर दिखाया गया था, मकसद ये दिखाना था कि कैसे अलग-अलग देश और रंग एक साथ मिलकर शांति से रह सकते हैं.
इंटरनेशनल कोऑपरेटिव अलायंस के झंडे पर भी ये रंग देखे जा सकते हैं.
बार्टम कहते हैं," रेन्बो हर उम्र के लोगों को आकर्षित करता है. हम सब को पता है कि ये वो समझ सकता है कि हमें क्या पसंद है. इसलिए ये काम करता है."
अगर आप सैन्य मामलों के बारे में कुछ भी नहीं जानते हैं, तब भी शायद आपने वाटरलू की लड़ाई के बारे में सुना होगा.
यह इतिहास में सबसे मशहूर लड़ाइयों में से एक है. 19वीं सदी की शुरुआत में अधिकांश यूरोप को जीतने वाले फ्रांसीसी सम्राट नेपोलियन बोनापार्ट की हार हुई थी.
नेपोलियन को देश निकाला देकर एल्बा द्वीप पर भेजा गया था.  में नेपोलियन ने 70 हज़ार की फ़ौज के साथ नीदरलैंड्स पर हमला करने का फैसला किया.
वहां नेपोलियन को उखाड़ फेंकने का मंसूबा लिए एक गठबंधन तैयार खड़ा था.
उस वर्ष 18 जून को, नेपोलियन की सेना का सामना, ब्रिटिश, डच, बेल्जियम और जर्मन सेनाओं के गठबंधन से हुआ.
गठबंधन सेना की कमान वेलिंग्टन के ड्यूक और प्रशिया की सेना मार्शल गेभार्ड वॉन ब्लूचर के नेतृत्व में लड़ी थी.
वाटरलू की ये लड़ाई भारी बारिश में लगभग दस घंटे चली.
कई इतिहासकारों का मानना है कि बारिश और कीचड़ ने नेपोलियन की हार में भूमिका निभाई जिसने बाद के यूरोप का इतिहास बदल गया.
वे तर्क देते हैं कि महान फ्रांसीसी रणनीतिकार नेपोलियन ने अपनी भारी घुड़सवार सेना के इस्तेमाल में देरी की, क्योंकि ज़मीन बहुत गीली थी और इससे उनके प्रतिद्वंद्वियों को फ़ायदा मिला.
नेपोलियन की ऐतिहासिक हार के दो सौ साल बाद एक और थ्यौरी सामने आई है.
इसके मुताबिक़ नेपोलियन की हार के पीछे 1815 में यूरोप में गर्मियों के दौरान हुई बारिश के कारणों को माना गया है.
वाटरलू की लड़ाई से दो महीने पहले इंडोनेशिया में माउंट तंबोरा नाम के एक ज्वालामुखी में विस्फोट हुआ था.
ज्वालामुखी से निकलने वाली भारी राख ने लगभग एक लाख लोगों की जान ले ली.
लेकिन यूरोप में नेपोलियन की हार, और इंडोनेशिया में ज्वालामुखी फटने के बीच क्या संबंध है?
इंपीरियल कॉलेज लंदन के भूविज्ञानी मैथ्यू येंज की ओर से प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक ज्वालामुखी की राख से आयनोस्फ़ेयर (वायुमंडल की ऊपरी तह) में "शॉर्ट सर्किट" बन गया. आयनोस्फ़ेयर में ही बादल बनते हैं.
इसकी वजह से यूरोप में भारी बारिश हुई. और इसी बारिश ने नेपोलियन की हार में योगदान दिया.
जर्नल जियोलॉजी में प्रकाशित मैथ्यू येंज के रिसर्च में ये भी बताया गया कि ज्वालामुखियों में होने वाला विस्फोट, विद्युतीकृत राख को इतनी ऊपर भेज सकता है, जितना पहले सोचा भी नहीं गया था.
मैथ्यू येंज बताते हैं, "जियोलॉजिस्ट पहले सोचते थे कि ज्वालामुखी की राख वायुमंडल की निचली परत में फंस जाती है क्योंकि ज्वालामुखी से उठा धुआं भी वहाँ तैरता है, हालांकि, मेरा शोध दिखाता है कि इलेक्ट्रिक फोर्स राख को ऊपरी वायुमंडल में भी भेज सकती है. कई प्रयोगों और कंप्यूटर के ज़रिए येंज ने साबित किया कि ज्वालामुखी के चार्ज कण, जो गोलाई में एक मीटर के 0.2 मिलियन से भी कम हैं, उन्हें बड़े विस्फोट से आयनोस्फ़ेयर में भेजा जा सकता है.
वहां वे आयनोस्फ़ेयर के इलेक्ट्रिक करंट में बाधा डालते हैं जिससे असामान्य बादल बनते हैं और बारिश होती है.
साल 1991 में फिलीपींस में माउंट पिनातुबू ज्वालामुखी के विस्फोट के बाद इसी प्रकार की गड़बड़ी दिखाई दी थी.
येंज अपनी खोज के ऐतिहासिक प्रभावों के बारे में कहते हैं, "लेस मिज़राबल उपन्यास में विक्टर ह्यूगो ने वाटरलू की लड़ाई के बारे में कहा है-असामान्य बादलों से भरा आकाश दुनिया के पतन के लिए काफ़ी था."
अगर वाकई एक ज्वालामुखी के फटने से नेपोलियन ने वाटरलू की जंग हारी होगी, तो ये इतिहास और मौसम के बीच संबंधों पर एक अनोखी खोज साबित हो सकती है.

No comments:

Post a Comment